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Minggu, 02 September 2012

एचआईवी की जांच अब घर पर भी करना मुमकिन |

एचआईवी की जांच अब पूरी गोपनीयता के साथ घर पर भी करना मुमकिन हो पाएगी। यह सुविधा अभी सिर्फ अमेरिका के लोगों को मिल पाएगी, मगर जल्द ही दुनिया के अन्य लोग भी इसका फायदा उठा पाएंगे।



अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने इसके लिए पहली बार विकसित की गई एक किट को मंजूरी दी है। यह दवा की किसी भी दुकान पर बिना डॉक्टर के पर्चे के मिल सकेगी। इसका नाम ओराक्विक इन होम एचआईवी टेस्ट किट रखा गया है। इससे एचआईवी टाइप-1 और टाइप-टु का टेस्ट घर पर ही किया जा सकेगा। यह 20 से 40 मिनट के भीतर टेस्ट का नतीजा बता देती है। यह टेस्ट किट भारत जैसे उन देशों के लिए काफी काम की साबित हो सकती है, जहां दूरदराज के इलाकों में स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पातीं।

ये पोस्ट नव भारत टाइम से लिया गया है इस पोस्ट को यहाँ लिखने का मकसद इस जानकारी को दुसरो तक पहुचना है |

Rabu, 23 Mei 2012

दुनिया के कुछ अनोखे घर |

दुनिया में लोग क्या क्या नहीं बनाते हैं,कुछ लोगो के दिमाग में एक से एक फितूर उठते रहते हैं और वो कुछ एसा करते या बनाते हैं जो दुसरो से हट के होते हैं|
दुनिया के कुछ अनोखे घर |































Kamis, 19 April 2012

इंजीनियरिंग का अध्बुध करिश्मा है "ओसाका फ्लाई ओवर"।

जापान के इंजीनियरों ने वो काम कर दिखाया है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।
जापान के फुकुसिमा शहर में फ्लाई ओवर बनाने के लिए जब जगह की कमी पड़ी तो जापान के इंजीनियरों ने एक सत्रह मजिला ईमारत के अंदर से फ्लाई ओवर को बना दिया ।इस फ्लाई ओवर को इस तरह से बनाया गया है की या ईमारत के किसी भी हिस्से को नहीं छुता है और ईमारत की लिफ्ट भी बिना रोक टोक के उपर निचे जा सकती है।


ये तस्वीर गूगल से लिया गया है

  

Minggu, 22 Januari 2012

पृथ्वी जेसा दूसरा गृह मिल गया जहा जीवन संभव है|

अमेरिका की अन्तरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिको ने पहली बार पृथ्वी के आलावा एक एसे ग्रह को खोजने का दावा किया है जहा जीवन संभव हो सकता है ।केप्लर-22 बी नाम का ये ग्रह हमारी धरती से तक़रीबन 600 प्रकाश वर्ष दूर है ।प्रकाश वर्ष उस दुरी को कहते है जो प्रकाश के द्वारा एक साल में तय की जाती है और प्रकाश एक सेकेण्ड में लगभग 1,86,282 मिल दुरी तय करती है ।

नासा के अनुसार केप्लर-22 हेबिटेबल जोन में है ।हेबिटेबल ज़ोन का मतलब होता है जहा की परिस्तिथि जीवन जीने के लायेक हो।हेबिटेबल होने का एक पैमाना उस ग्रह की अपने सूरज से दुरी भी होती है ।
हमारी पृथ्वी सूरज से जितनी दूर है,केप्लर-22 भी अपने सूरज से लगभग 15 प्रतिशत नजदीक है ।

केप्लर-22 का सूरज हमारे सूरज के मुकाबले ठंडा और साइज़ में छोटा है ।लेकिन केप्लर-22 के सूरज की रौशनी हमारे सूरज के रौशनी से 25 प्रतिशत कम है इसलिए केप्लर-22 का तापमान भी कम है ।
इस नए ग्रह की खोज केप्लर नाम के दूरबीन के द्वारा हुई है ये बहुत ही सवेदनशील दूरबीन है और इसके द्वारा अब तक लगभग 2000 नए ग्रहों की खोज हो चुकी है ।
  • केप्लर-22 पृथ्वी से लगभग 2.4 गुना बड़ा है ।
  • पृथ्वी से केप्लर-22 की दुरी लगभग 600 प्रकाश वर्ष है| 
  • 290 दिन का साल होता है केप्लर-22 पर ।
  • लगभग 22 डिग्री सेंटी ग्रेड औसत तापमान है केप्लर-22 का ।    

      

Rabu, 29 Juni 2011

ये 42 किलोमीटर लम्बा पुल 5 हज़ार खम्भों पर टिका है |

दुनिया का सबसे लम्बा पुल चीन में बन के तईयार हो गया है और आम जनता के लिए उसे गुरुवार को खोल दिया गया |
जियाओझोऊ खाड़ी पर बना ये पुल लगभग 42 किलोमीटर लम्बा है |
इस पुल की आधिकतम चवडाइ 35 मीटर है |
इस 42 किलोमीटर लम्बे पुल को बनाने में कुल 2.5 अरब रुपया खर्च हुवा है |
और ये 42 किलोमीटर लम्बा पुल 5 हज़ार खम्भों पर टिका है |           




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Selasa, 17 Mei 2011

बरमूडा त्रिकोण जिसे दानवी त्रिकोण भी कहा जाता है|

बरमूडा त्रिकोण( Bermuda Triangle ) अटलांटिक महासागर का वो भाग है, जिसे दानवी त्रिकोण / शैतानी त्रिभुज / मौत के त्रिकोण / भुतहा त्रिकोण ( डेविल्‍स ट्राइएंगल ) भी कहा जाता है क्योकि वर्ष 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी घटनाऍं / दुर्घटनाऍं घटित होती रही हैं। यह एक रहस्यमयी जलक्षेत्र जो उत्‍तरी अटलांटिक महासागर में स्थित है,
जिसकी गुत्थी आज तक कोई नहीं सुलझा सका है। यहाँ अब तक सैकड़ों - हजारों की संख्या में विमान, पानी के जहाज़ तथा व्यक्ति गये और संदिग्‍ध रूप से लापता हो गये और लाख कोशिशों के बाद भी उनका पता नहीं लगाया जा सका है। ऐसा कभी-कभार नहीं, बल्कि कई बार हो चुका है। यही वह कारण है कि आज भी इसके आस-पास से गुजरने वाले जहाजों और वायुयानों के चालक दल के सदस्‍य व यात्री सिहर उठते हैं। सैकडॊं वर्षों से यह त्रिकोण वैज्ञानिकों, इतिहासकर्ताओं और खोजकर्ताओं के लिए भी एक बड़ा रहस्‍य बना हुआ है।
अटलांटिक महासागर के इस भाग में जहाजों और वायुयानों के गायब होने की जो घटनाएं अब तक हुई हैं उनमें पाया गया है कि जब भी कोई जहाज़ या वायुयान यहां पहुंचता है, उसके राडार, रेडियो वायरलेस और कम्पास जैसे यन्त्र या तो ठीक से काम नहीं करते या फिर धीरे-धीरे काम करना ही बन्द कर देते हैं। जिस से इन जहाजों और वायुयानों का शेष विश्व से संपर्क टूट जाता है। उनके अपने दिशासूचक यन्त्र भी खराब हो जाते हैं। इस प्रकार ये अपना मार्ग भटक कर या तो किसी दुघर्टना का शिकार हो जाते हैं या फिर इस रहस्यमय क्षेत्र में कहीं गुम होकर इसके रहस्य को और भी अधिक गहरा देते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में भौतिक के कुछ नियम बदल जाते हैं, जिस कारण ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं। कुछ लोग इसे किसी परालौकिक ताकत की करामात मानते हैं, तो कुछ को यह सामान्य घटनाक्रम लग रहा है। यह विषय कितना रोचक है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर कई किताबें और लेख लिखे जाने के साथ ही फ़िल्में भी बन चुकी हैं। तमाम तरह के शोध भी हुए लेकिन तमाम शोध और जांच - पड़ताल के बाद भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है कि आखिर गायब हुए जहाजों का पता क्यों नहीं लग पाया, उन्हें आसमान निगल गया या समुद्र लील गया, दुर्घटना की स्थिति में भी मलबा तो मिलता, लेकिन जहाजों और विमानों का मलबा तक नहीं मिला ।
बरमूदा त्रिकोण के संबन्द्ध में सबसे अधिक रहस्यमयी घटना को `मैरी सैलेस्ट´ नामक जहाज़ के साथ जोड़ कर देखा जाता है। 5 नवम्बर, 1872 को यह जहाज़ न्यूयॉर्क से जिनोआ के लिए चला, लेकिन वहां कभी नहीं पहुंच पाया। बाद में ठीक एक माह के उपरान्त 5 दिसम्बर, 1872 को यह जहाज़ अटलांटिक महासागर में सही-सलामत हालत में मिला, परन्तु इस पर एक भी व्यक्ति नहीं था। अन्दर खाने की मेज सजी हुई थी, किन्तु खाने वाला कोई न था। इस पर सवार सभी व्यक्ति कहां चले गये ? खाने की मेज किसने, कब और क्यों लगाई ? ये सभी सवाल आज तक एक अनसुलझी पहेली ही बने हुए हैं।

वैज्ञानिकों ने इसके पीछे ऐसे कारण बताए हैं जो इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। ये कारण इस प्रकार हैं ---

मीथेन गैस
कुछ रसायन शास्त्रियों क मत है कि उस क्षेत्र में 'मीथेन हाइड्रेट' नामक रसायन इन दुर्घटनाओं का कारण है। समुद्र में बनने वाला यह हाइड्राइट जब अचानक ही फटता है, तो अपने आसपास के सभी जहाजों को चपेट में ले सकता है। यदि इसका क्षेत्रफल काफ़ी बड़ा हो, तो यह बड़े से बडे जहाज़ को डुबो भी सकता है।

चुम्बकीय क्षेत्र
बहुत से विद्वानों का मत है कि सागर के इस भाग में एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र होने के कारण जहाजों में लगे उपकरण यहाँ काम करना बंद कर देते हैं तथा रेडियो तरंगों के संकेतों को काट कर इन यन्त्रों को खराब कर देता है इससे जहाज़ रास्ता भटक जाते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

परग्रही
इसका रहस्य तब और भी अधिक गहरा हो जाता है जब कुछ लोग इन दुर्घटनाओं को परग्रही शक्तितियों और `उड़नतश्तरियों´ से जोड़ कर देखते हैं ।

और कई दूसरे कारण
कुछ लोग इन घटनाओं को संयोग मानते हैं, परन्तु इतने सारे जहाजों और वायुयानों का केवल इस विशेष त्रिभुजाकार क्षेत्र में ही गायब होना मात्र संयोग नहीं हो सकता। जबकि कुछ वैज्ञानिक इन दुघर्टनाओं का कारण गुरुत्वाकर्षण की शक्ति बताते हैं। कुछ लोग इन घटनाओं को प्राकृति बताते हुए समुद्र के इस भाग के नीचे स्थित स्फटिक पदार्थों, जलचक्रों (भंवरों), समुद्री तल से उत्पन्न समुद्री भूचालों को इनका दोषी मानते हैं तथा बहुत से ऐसे व्यक्ति हैं जिनका मानना है कि ये दुर्घटनाएं मशीनी खराबी मात्र ही हैं।

आखिर कहां पर है बारमूडा-----------
बरमूडा उत्तर अटलांटिक महासागर में स्थित ब्रिटेन का प्रवासी क्षेत्र है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर मियामी (फ्लोरिडा) से सिर्फ़ 1770 किलोमीटर और हैलिफैक्स, नोवा स्कोटिया (कनाडा) के दक्षिण में 1350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह सबसे पुराना और सबसे अधिक जनसंख्या वाला ब्रिटेन का प्रवासी क्षेत्र है।


इस दानवी त्रिभुज के बारे में कहा जाता है कि जो यहां गया वापस न आ सका। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां गायब होने वाले जहाजों को ढूंढ़ पाना भी आसान नहीं होता। इस इलाके में गायब होने वाले जहाजों का कोई अता-पता नहीं चलता। यही कारण है कि बहुत से जहाजों व विमानों के गायब होने का कोई लिखित ब्यौरा भी नहीं है। दर्ज किए गए ब्यौरे के अनुसार इस इलाके में 125 वायुयान और क़रीब 50 जहाज़ डूब चुके हैं।


श्रोत----इस पोस्ट को यहाँ से लिया गया है |  



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